महासती श्री नगीनाजी और उनको परिवार
महासती श्री नगीनाजीमेवाड़ के साध्वी-समाज के इतिहास की सभुज्जल करने वाली प्रधान महासतियों में नगीनाजी का स्थान महत्वपूर्ण है ।
ये नन्दजी महासती जी की सबसे बड़ी शिष्या थी । नन्दूजी अपने युग की महत्त्वपूर्ण साध्वीजी रही होगी । तभी उनके नाम का सिंघाड़ा कहलाता है । खेद की बात है कि नन्दूजी के विषय में खोज करने पर भी कोई जानकारी नहीं मिल सकी। नन्दूजी के नगीनाजी के अलावा कुन्दनजी और गंगाजी इस तरह दो शिष्याएँ और थी । किन्तु उनका परिचय भी अज्ञात है । नगीनाजी का जो कुछ परिचय मिल पाया, वह इस प्रकार है - इतिहास रखने की पद्धति का नितान्त अभाव होने के कारण सतियों के विषय में सामयिक जानकारी मिलना तो नितान्त कठिन है।
नगीनाजी का जन्म कब हुआ, यह सुविदित नहीं है । किन्तु उनकी एक शिष्या देवकुंवरजी का अवश्य पता चलता है, जिन्होंने वि.सं. १९३३ में तपस्या की थी। महासती नगीनाजी ने वीस वर्ष की आयु में दीक्षा ली थी। उनके दीक्षा लेने के १०-१२ वर्ष बाद ही देवकुंवरजी उनकी शिष्या हुई होंगी । इस आधार पर महासतीजी का जन्म वि.सं. १६०० या १६०२ के आस-पास माना जा सकता है। इनका जन्मस्थान पोटलां था । भोपराजजी पामेचा इनके पिता थे । इनकी माता का नाम गुलाबबाई था । तेरह वर्ष की उम्र में कपासन निवासी मोजीरामजी मारू के छोटे पुत्र पृथ्वीराज जी से इनका ब्याह रच दिया गया । विवाहित जीवन केवल सात वर्ष रहा । पति का देहावसान हो गया।
परम विदुषी महासती जी श्री नन्दूजी के सम्पर्क से नगीनाजी को वैराग्य रस छाया । उन्होंने दीक्षा की बात चलाई तो एकमात्र पुत्र धनराज जी तथा उनके काका लोगों ने न केवल कड़ा विरोध किया, प्रत्युत कई कठिन परीप्रह भी दिये । नगीनाजी को जब आज्ञा मिलना असंभव लगा तो उन्होंने अपना जीवन बदल दिया। गृहस्थावस्था में ही केशों का हाथों से खंचन करना तथा भिक्षा से आहार लेना प्रारम्भ कर दिया। नगीनाजी के इन प्रयत्नों से पारिवारिक व्यक्ति बहुत अधिक सख्त हो गए। उन्होंने नगीनाजी को लोहे की जंजीरों से बाँधकर एक कमरे में बन्द कर दिया और ऊपर बड़ा ताला लगा दिया। नगीनाजी भीतर धर्म ध्यान की आराधना में लगे थे। कहते है, जंजीरों के बन्धन तडातड़ टूट गये और द्वार का ताला भी टूट गया। अनायास ही ऐसा हो जाना, किसी बहुत बड़े चमत्कार से कम नहीं थी । पूरा गांव यह दृश्य देखकर दंग रह गया । धर्मप्रेमी सज्जनों ने पारिवारिक-जनों को समझाया कि आज्ञा नहीं देने से तुम्हारा भी कुछ अनिष्ट हो सकता है । अन्त में सभी सहमत हुए और देलवाड़ा में नगीनाजी की दीक्षा सम्पन्न हुई।
श्री नगीनाजी का शास्त्रीय ज्ञान बढा-चढा था । इसका प्रमाण यह है कि आमेट में शुद्ध स्थानकवासी जैन धर्म की श्रद्धा से हटे चालीस परिवारों को पुनः श्रद्धा में स्थापित किया । ऐसा भी प्रमाण मिलता है कि सरदारगढ़ में, जहाँ उनका स्वर्गवास हुआ, स्वर्गवास से एक दिन पहले तक तेरापंथियों से चर्चा में वे लगे । इससे उनके श्रुताभ्यास का विस्तुत और गहन होना पाया जाता है। नगीनाजी के कई शिष्याएँ थी । उनमें चन्दूजी, मगनाजी, गेंदकुँवरजी, कंकूजी, प्यारांजी, फूलकुंवरजी, सुन्दरजी, देवकुंवरजी और सरेकुंवरजी के नाम ज्ञात हुए है । चन्दुजी नगीनाजी की बड़ी शिष्या थी, जिनके इन्द्राजी और वरदूजी नामक दो शिष्याएँ रहीं।
नगीनाजी के शिष्या-परिवार में श्री मगनाजी, प्यारांजी, कंकूजी, देवकुँवरजी, इन्द्राजी (चन्दुओं की शिष्या) अच्छी तपस्विनी सतियाँ थी। श्री रंगलालजी तातेड़ ने १९३७ में एक ढाल लिखी, जिसमें इन महासतियों की तपस्या का थोड़ा परिचय मिलता है । किन्तु उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि किन-किन सतीजी ने कौन-कौन सा तप किया । उन्होंने समुच्चय लिख दिया । किन्तु तप इनमें से ही किसी ने किया, यह तो निश्चित है।
सन १९३३ के कपासन चातुर्मास में ७५ दिनों का तप हुआ । २४८ छुटकर खंद हुए । कहते है, केसर की वर्षा हुई।
सन १९३४ में उदयपुर में ३४ और ३५ दिनों की तपश्चर्या हुई ।
सादड़ी (मेवाड़), पाँच माह और ग्यारह दिनों का दिर्घ तप हुआ । १७५ मूक बलि से बचाये गये । राजाजी ने कार्तिक मास में जीवहिंसा के त्याग किये।
सन. १९३६ में खेरोदा में ६६ दिनों का दीर्घतप हुआ । १२५ खंद हुए।
सन १९३७ में आमेट में ६१, ४४ तथा ३३ दिनों के तप हुए।
सन १९३८ में कपासन में ४९ दिनों का तप हुआ । एक सिघाड़ा आकोला था वह ४६ दिनों का तप हुआ।
सन १९३९ में रतलाम में ३ माह, ८८ दिन तथा ३३ दिन के बड़े तप हुए।
सन १९४१ में सलोदा में ३१ दिन का तप हुआ । इसी तरह उदयपुर चातुर्मास में ३३ दिन की तपस्या हुई । सनवाड़ और ऊंचालन चातुर्मास में भी तपाराधनाएँ हुईं।
उपयुक्त सादड़ी चातुर्मास के अवसर पर एक सती ने १३ बोल का अभिग्रह किया । उनमें कुमारिका कन्या, खुलेबाल, काँसो (क धातु) का कटोरा , सच्चा मोती, कोरा वस्त्र, माल पर विन्दी आदि बोल थे। श्री गोटीलालजी मेहता को स्वप्न में यह सब ज्ञात हुआ तब अभिटर फला। महासती इन्द्राजी ने सनवाड़ में अभिग्रह किया कि विवाह के अवसर पर भेष जिसके शरीर पर हो उसके हाथों आहार लेना । कई दिनों के बाद यह अभिग्रह भोपाल सागर वाले कमलचन्दजी बापना के द्वारा फला । उन्होंने जमीकन्द का त्याग किया। महासती इन्द्राजी अभिग्रह में सर्वाधिक रूचि रखती थी। उन्होंने पलाना में ४५ दिनकी तपस्या के पारणे पर काटेका अभिमाह लिया। इसी तरह रायपुर में भतीजा मेवे की खिचड़ी बहराए, ऐसा अभिग्रह लिया । आकोला में मूंछ के बाल का अभिग्रह लिया। तप ही जिनके जीवन का अंग हो, ऐसी तपस्वी विभूतियां कई विचित्रताएँ लेकर चलती हैं, जिन्हें देख-सुनकर सामान्य व्यक्ति अर्व में डूब जाया करता है।
महासती श्री धनाजीपाठक श्री नगीनाजी की शिष्याओं में एक नाम कंकूजी का पढ चुके है । धनाजी उन्हीं की शिष्या है । यों कंकूजी के चार शिष्याएँ थी - धनाजी, सुहागाजी, सुन्दरजी और सोहनाजी धनाजी प्रथम शिष्या थीं । ये खारोलवंशी भूरजी और भगवतबाई की संतान थी । इनका जन्मस्थान रायपुर है। स. १९४८ के लगभग इनका जन्म हुआ था । बहुत छोटी नौ वर्ष की उम्र में महासती श्री कंकुजी के सम्पर्क से इन्हें वैराग्य हुआ । सं. १९५७ वैशाख शुक्ला तृतीया (अखातीज) के दिन कोशीथल में इनकी दीक्षा सम्पन्न हुई । सं. २०२६ मे इनका स्वर्गवास हुआ। श्री रामाजी, मानाजी, चतरकुंवरजी, सोहनकुँवरजी, सेणाजी इनकी शिष्याएँ हुई । प्रारम्भ की दो महासतियों का स्वर्गवास हो चुका है शेष तीन विद्यमान हैं। महासती सोहनकुँवरजी की माताजी ने भी दीक्षा ली । उनका स्वर्गवास हो गया । सोहनकुंवरजी को शिष्याएँ श्री नाथकुँवरजी (श्री सौभाग्य मुनिजी की माताजी), श्री उगमवतीजी (श्री सौभाग्य मुनिजी की बहन) और कमलाजी हुई।
महासतीजी मोड़ांजी पेमांजी आदिमहासती कंकूजी की एक शिष्या श्री सुहागाजी थीं । मोड़ाजी उन्हीं की शिष्या हैं । नकूम में सहलोत गोत्र में इनका जन्म हुआ और बड़ी सादड़ी में इनका विवाह हुआ । कुछ वर्षों में ही ये वैधव्य पा गई । इनकी दीक्षा बड़ी सादड़ी में ही हुई, उस समय बीस वर्ष की उम्र थी । महासती मोड़ाजी भद्रपरिणामी, सरल, सात्त्वि, आचारनिष्ठ महासती जी थी । संवत् २००३ ज्येष्ठ कृष्णा ११ को हणु तिया (जिला-अजमेर) में इनका स्वर्गवास हुआ। पेपांजी इन्ही की प्रथम शिष्या थीं । रतनकुँवरजी, खोड़ाजी, लेरकुंवरजी, राधाजी, रतनजी ये मोड़ांजी की कुल शिष्याएँ हुई। पेपांजी थामला के श्री ताराचन्दजी सलूबाई की संतान थी । इन्हें ११ वर्ष की उम्र में नाथद्वारा निवासी नन्दलालजी कोठारी के पुत्र कन्हैयालालजी के साथ विवाहित कर दिया था । कन्हैयालालजी केवल तीन माह जीए । महासतीजी श्री मोडाजी के सम्पर्क में इन्हें वैराग्योदय हुआ । सं. १९८३ में बड़ी सादड़ी में इनकी दीक्षा सम्पन्न हुई । दीक्षा रतनलाल जी पामेचा के घर से हई। श्री पेपांजी सात्विक प्रकृति की थोकड़ों का ज्ञान रखने वाली तप रूचि वाली महासतीजी थी। इन्होंने जावद में २५ दिन की तपस्या पर पापड़ का अभिग्रह किया। सं. २०२६ वैशाख सुदी ११ के दिन के दिन पलाना में इनका स्वर्गवास हुआ । मोडांजी की शिष्याओं में से अभी श्री रतनकुंवरजी, श्री लहरकुँवरजी दो महासतियाँ विद्यमान है ।
प्रवर्तिनी श्री सरुपांजी और उनका परिवार
मेवाड़ में यतिवाद के प्रचण्ड प्रभाव को उखाड़ कर फैंकने और शद्ध अध्यात्मवादी साधमार्ग का घर-घर प्रचार करने के कार्य में जहाँ घोर तपस्वी, उत्कृष्ट आचारवान, धैर्यशील उग्र बिहारी मुनिराजों का प्रमुख हाथ रहा वहाँ इस प्रदेश में विचरण करने वाली महासतियों का भी कम सहयोग नहीं था। मनिराजों ही नहीं महासतियों ने भी उग्र तपश्चरण करके और अध्यात्मवादी शद्ध जीवन का परिचय देकर जनमानस को जड़वाद से बाहर खींचा । मेवाड़ में आज जो स्थानकवासी समाज लहलहा रहा है । इसका श्रेय इधर की शानदार महासती परम्परा को भी है। मेवाड़ की साध्वी परम्परा में मुख्यतया दो धाराएँ बहुत दूर से है। एक धारा की प्रतिनिधि महासती श्री नगीना जी और उनकी परम्परा का परिचय जो मिल पाया आगे दिया जा चुका है । इस निबन्ध में हम दूसरी धारा, जिसकी अग्रगण्या महासतीजी श्री सरूपांजी है उसका परिचय दे रहे है ।
प्रवर्तिनी श्री सरुपांजी महाराजपूज्य श्री एकलिंगदासजी महाराज को आचार्य पद प्रदान उसके बाद साध्वी समाज ने मिलकर श्री सरूपां जी को सुयोग समझकर प्रवर्तिनी का पद समर्पित किया । श्री सरुपांजी, निश्चय ही उस समय के साध्वी मण्डल में श्रेष्ठ होंगी तभी यह साध्वी समाज का श्रेष्ठ पद उन्हें दिया गया।
खेद की बातवस्तुत: यह बड़े खेद की बात है कि परम विदुषी, अग्रगण्या तथा प्रर्वितनी पद विभूषिता उस साध्वी रत्न का हम इससे अधिक कुछ भी परिचय देने में समर्थ नहीं है । हमने बहुत कुछ जानने का प्रयास किया । उस परम्परा की महासतियों से ओर अन्य वृद्धों से भी उनका परिचय पाना चाहा किन्तु अधिक कुछ भी परिचय नहीं मिल सका।
शिष्याएँश्री सरुपां जी महाराज के कई शिष्याएँ थीं । उनमें चम्पाजी, सलेकुँवरजी, लेरकुँवरजी, हगामीजी और सरेकुँवरजी मुख्य थी । सरेकुँवरजी आकोला के थे।
कस्तूरांजी और उनका सिंघाड़ाश्री कस्तूरांजी की केवल इससे अधिक कोई जानकारी नहीं कि वे एक तपस्विनी थीं। उन्होनें रायपुर में इकवीस दिन, घासा में छब्बीस दिन, देलवाड़ा में तेरह दिन आकोला में उन्नीस की तपश्चर्या की थी । देवगढ़ में बेले बेले पारणे किये । परदेशी तप किया और मोलेला में इगतालीस दिन का दीर्घ तप किया । सरदारगढ़ में इगतीस दिन का तप किया । इनका जन्मस्थान मोलेला या तथा ससुराल नाथद्वारा में था।
शिष्याएँ और प्रशिष्याएंघोर तपस्विनी परम विदुषी महासतीजी श्री कस्तूरांजी की शिष्यओं में फुलकुँवरजी प्रधान थे। फूलकुँवरजी की शिष्या परम तपस्वी महासतीजी श्री श्रृंगार कुँवरजी थी।
श्री श्रृंगार कुँवरजीश्री श्रृंगार कुँवरजी मेवाड़ में सणगारांजी के नाम से प्रसिद्ध थी । पोटलां के ओसवंशीय सियाल परिवार से प्रवजित हुई, महासती जी, 2. साध्वी समाज में सिहनी जैसी तेजस्वी थी । शास्त्रीय ज्ञान की तो मानो भंडार ही थी । श्री सणगारांजी का व्याखान, एक ओजस्वी व्याख्यान था। मेवाड़ का तत्कालीन जैन समाज, इनसे बड़ा प्रभावित था।
पूज्य श्री एकलिंगदासजी महाराज को स्वर्गवास के बाद मेवाड़ में जो भिन्नता आई और उससे श्री विश्रृंखलता पैदा हुई, उसे मिटाने का इन्होंने बड़ा कड़ा प्रयत्न किया । पूज्य श्री मोतीलालजी महाराज आचार्य बनने को तैयार नही थे । प्रायः सभी प्रयत्न करके थक गये अन्त में सणगारांजी ने महाराज को मनाने का बीड़ा उठाया।
उन्होंने पूज्य श्री मोतीलालजी महाराज को एक वाक्य कहा - पूत कपूत होते हैं तब बाप की पगड़ी खूटी पर टँगी रहती है । बस यह एक वाक्य ही बहुत था । पूज्य श्री ने अपना आग्रह छोड़ दिया । महासती सणगारां जी समयज्ञ और प्रभावशाली महासती थी इनके अनेक शिष्याएं हुई। कुछ का परिचय निम्नानुसार है।
दाखांजी (सहाड़ा के), झमकूजी (पोटलां के), सोहन कुँवरजी (नाई के), मदन कुँवरजी, हरकूजी (भीम के) राधाजी, राजकुंवरजी (ओडण के) पान कुँवरजी (नाथद्वारा के) वरदूजी, वलावरजी, किशन कुँवरजी (नाई के) मगनाजी (राज करेड़ा के) आदि । सभी महासतीजी अच्छे पात्र तथा शान्त स्वभावी थे किन्तु खेद का विषय है कि इतने बड़े शिष्या परिवार में से आज कोई उपलब्ध नहीं है और न इस परम्परा में कोई साध्वी जी ही है।
जड़ावांजी वरदूजी का परिवारएक महासतीजी थे जड़ाव कुँवरजी । ये इन्हीं सिंघाड़ो में से एक कुल के होगें, इनका कोई परिचय उपलब्ध नहीं है । उनकी शिष्या वरदूजी थे। महासती वरदूजी महासती वरदूजी उदयपुर के थे । पारिवारिक परिचय ज्ञात नहीं। कब संयम लिया, कितने वर्ष संयम पाला तथा स्वर्गवास का समय क्या था इस विषय में कोई जानकारी नही मिली । जो जानकारी मिली उसके अनुसार ज्ञात हुआ कि वरदूजी महाराज सरल स्वभावी, संयमप्रिय.. तपस्वीनी महासतीजी थी । इन्होंने अपने जीवन काल में ग्यारह अठाईयाँ की, काली राणी का तप किया, एक लड़ी पूरी की। बेले बेले पारणे किये । पारणे में आयंबिल करते थे । स्वर्गवास सरदारगढ़ में हआ । स्वर्गवास में पूर्व, सजा-सजाया हाथी देखा और उसी क्षण उनका स्वर्गवास हो गया।
स्वर्गोत्सव के लिए मुख वस्त्रिका उदयपुर से रजत की बनकर आई बहु और सरदारगढ़ ठाकुर साहब ने जो चदर ओढ़ाई ये दोनों वस्तुएं आग में नहीं जलीं । ज्यों की त्यों पाई गई ऐसा कहा जाता है । श्री वरदूजी महाराज के कई शिष्याएँ थी । केर कुँवरजी, नगीनाजी, गेंद कुँवरजी, हगामाजी आदि।
परम विदुषी महासतीजी श्री केर कुँवरजीविदुषी महासतीजी श्री केशर कुँवरजी, जो मेवाड़ भर में केर कुंवरजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध है। श्री वरदूजी महाराज की बड़ी शिष्या है । रेलमगरा के खानदानी मेहता परिवार में संवत् १९४० में जन्म पाये । पिता का नाम धूकलचन्दजी था और माता नवलबाई । योग्यावस्था में भूपालसागर इनका विवाह हुआ । किन्तु दाम्पत्य-जीवन अधिक नहीं टिका ।
परम विदुषी महासतीजी श्री वरदूजी के सम्पर्क से वैराग्य ज्योति जगी । वि. संवत १९५७ में माघ शुक्ला पंचमी नामक शुभ दिन में उनकी दीक्षा सम्पन्न हुई। कनक के समान दैदीप्यमान देह राशि से सम्पन्न, महासती केर कुंवरजी महाराज, बड़े मिलनसार, उदार हृदय, क्रियापात्र और मिष्ट र भाषी थे । मेवाड़ के अन्तर्वति क्षेत्रों में इनका बड़ा गहरा प्रचार था । हजारों भाई-बहन आज भी महातीजी को बड़ी श्रद्धा के साथ स्मृति करते ) द हैं। पूज्य आचार्य श्री मोतीलालजी महाराज की सृदृढ आज्ञानुवर्तिनी महासती केर कुँवरजी समाज के व्यापक हित को लक्ष्य में रखकर उचित - निर्णय करती थी।
विशाल शास्त्रीय ज्ञान से सम्पन्न महासतीजी में ज्ञान प्रचार की बड़ी लगन थी। उन्होंने सैंकड़ों बहनों को बोल थोकडों का गम्भीर ज्ञान प्रदान किया । पिछले कई वर्षोह तक शारीरिक कारण से रायपुर में स्थानापन्न रहे । रायपुर के धर्मप्रिय भाई-बहनों ने बड़े उत्कृष्ट भावों से सेवासाधी । महासतीजी के मृदुल स्वभाव से उनकी लोकप्रियता इतनी फैली कि बच्चा-बच्चा आज भी उन्हें याद करता है।
महासतीजी अधिकतर ज्ञान-ध्यान में रत रहा करती थी । वि. संवत. २०११ ज्येष्ठ कृष्णा चौथ शुक्रवार को देवलोक हुए । स्वर्गवास होने से पूर्व संथारा धारण कर लिया था। इनके नौ शिष्याऐ हुई । कंचन कुंवरजी, दाखांजी, सौभाग्य कुंवरजी, सज्जन कुंवरजी, रुप कुंवरजी, प्रेमकुंवरजी, मोहन कुंवरजी, प्रताप कुंवरजी। कञ्चन कुंवरजी
कञ्चन कुंवरजीभद्र परिणामी महासती थे, उनकी शिष्या चाँद कंवरजी थे। महासतीजी श्री सौभाग्य कंवरजी सरल स्वभावी श्री सौभाग्य कुंवरजी भींडर के हैं।
महासती रुपकुंवरजीदेवरिया में पूज्यश्री के नेतृत्व में तीन दीक्षाएँ एक साथ हुई, महासती रुप कुंवरजी महासती सज्जन कुंवरजी, महासती प्रेमवती जी। G श्री रुपकुंवरजी देवरिया के ही कोणरी परिवार के है । वाणी से मधुर एवं स्वभाव से सरल है । शास्त्रों का ज्ञानाभ्यास भी किया, व्याख्यान को भी अच्छी कला है । इनके दो शिष्याऐं है, श्री रतन कुंवरजी ये चिकारड़ा के है । और दुसरी शिष्या लाभवन्ती है ये टाटगढ़ के है । इनमें तपश्चर्या का विशेष गुण है।
महासती सज्जन कुंवरजीइन्होंने कोशीथल में पूज्य गुरुदेव श्री के सान्निध्य में महासतीजी श्री केर कुंवरजी के पास संयम ग्रहण किया । साथ में अपनी पुत्री कुमारी प्रेमवती को भी संयम के लिए प्रेरित किया और उसे संयम दिलाया । खाखरमाला के श्री गणेशलालजी दक तथा चाँदबाई की संतान ८ सज्जनजी कोशीथल विवाहित किये गये । वैराग्य की तीव्र भावना से प्रेरित हो, संयम धारण किया और अन्त तक उसे निभाया। स्वभाव से खरे, महासती सज्जन कुंवरजी बड़े जागरुक विचारों के थे। संवत २०२४ दीपावली की रात्रि में स्वर्गवास पाये, उससे पूर्व त्याग प्रत्याख्यान की स्थिति में थे । प्रेमवती जो संसार पक्ष में इनकी पुत्री थी, वही उनकी शिष्या भी बनी।
महासती प्रेमवतीमेवाड़ के जैन जगत में सर्वाधिक यदि कीसी जैन महासतीजी का नाम लिया जाता है तो वह है पुज्य गुरुणी मैया प्रेमवती म.सा. । आपका जन्म माघ सुद १४ संवत् १९८३ गुरूवार को मेवाड़ के कोशीथल ग्राम में पिता भुरालालजी पोखरणा व माताजी सज्जनबाई पोखरणा के यहां हुआ। आपने माघ कृष्णा प्रतिपदा गुरुवार संवत १९९६ माघ १३ वर्ष उम्र मे दीक्षा अंगीकार की । दीक्षा ग्राम देवरीया जिला भीलवाड़ा में भुतपुर्व आचार्य मोतीलालजी म.सा. व जनजन के श्रद्धा केन्द्र पुज्य प्रर्वतक अंबालालजी म.सा. के सानीध्य मे प्राप्त की । आपका प्रथम & चातुर्मास देलवाड़ा गुरुणीकेर कुंवरजी म.सा. के सानिध्य में हुआ । स्वतंत्र चातुर्मास संवत् २००६ का ग्राम कोशीथल मे हुआ व अंतीम " चातुर्मास संवत २०५६ का फतहनगर में हुआ । आपकी वाणी में जादु था जो भी एक बार आपके सानिध्य में आता वह आपका बनकर रह जाता था । आपको समाज ने राष्ट्रज्योती, राजस्थान सिंहनी, साध्वी शिरोमणी, प्रवचन भुषण आदि कई उपाधीयों से सम्मानित किया गया। आपने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मेवाड़ के एक एक ग्राम में विचरण किया । अंत में आपकी जन्म-भूमी कोशीथल मे ही २४ जुन २०००८ वि.म. २०५७ अषाढ कृष्णा ७ शनिवार को देवलोक गमन किया । आपके पिछे श्री राजमतीजी म.सा. . तप ज्योती श्री विजय प्रभाजी म.सा. श्री विजयलताजी म.सा., श्री विनयलताजी म.सा., श्री विद्याश्रीजी म.सा., श्री प्रज्ञाश्रीजी म.सा. आदि महासतीजी आपकी धरोहर को संभाले हुए है । इन सभी का जीवन मंगलमय हो व दीघार्यु हो।
भारतीय संस्कृति और विश्वासभारतीय संस्कृति में आदर्शों की पूजा होती रही है । मूल्य यहां प्राणों से भी अधिक प्रिय समझे जाते है। समय आने पर भारतीय अपने आदर्स की रक्षा करते हुए, अपना बलिदान तक देते रहे हैं । विश्वासों का ऐसा जीवन स्पर्शी स्वरुप जो भारत में उपलब्ध है विश्व में अन्यत्र मिल पाना कठिन है । विश्व आज आस्था हीनता के दौर से गुजर रहा है, ऐसी स्थिति में भी भारत में आस्थापूर्ण वातावरण व्याप्त है और यह इस राष्ट्र का परम सौभाग्य है । विश्वास भारतीय अस्मिता का अंग है । किसी को भी भारतीयों की आस्था से खिलवाड़ नहीं करना चाहिये । भारतीयों की संपूर्ण जीवन पद्धति अध्यात्मिक विश्वासों के ताने बाने से बुनी गई है । यदि यहाँ विश्वास टूट गये तो सारी जीवन पद्धति ही छिन्न भिन्न हो जाएगी । भारतीयों के विश्वास अनेक तरह के है फिर भी उनमें कही न कहीं एक रुपता रही हुई है।
- सौभाग्य मुनि “कुमुद”